महिलाओं की सुरक्षा के लिए वीमेन पुलिसिंग की जरूरत

पूर्वी भारत में घरेलू हिंसा के सर्वाधिक मामले झारखंड में हैं। महिला दिवस को लेकर जगह-जगह सेमीनार, सम्मेलन शुरू हो चुके हैं। महिलाओं को भयमुक्त और सशक्त कैसे बनाया जाए, यह गंभीर सवाल आज भी खड़ा है। इस पर प्रकाश डाल रही हैं दक्षिणी छोटानागपुर रेंज की डीआईजी संपत मीणा।

लिंग आधारित पुलिसिंग के तहत पहली बार वर्ष 1986 में दिल्ली में क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल (सीएडब्लू) बनाया गया। लिंग आधारित पुलिसिंग के तहत महिलाओं के प्रति होनेवाले अपराधों को अधिक गंभीरता व संवेदनात्मक रूप से लेने के लिए कई कदम उठाए गए। जैसे- महिला थाना, हेल्पलाइन आदि।

लिंग आधारित पुलिसिंग का अर्थ : इससे तात्पर्य लिंग विशेष की समस्याओं को ध्यान में रखकर कदम उठाना है। महिलाओं की समस्याओं, मामलों का अन्वेषण, आपराधिक कृत्य और अन्य समस्याओं के निदान हेतु विशेष पुलिस व्यवस्था।

जरूरत क्यों : महिलाओं के प्रति अपराध के मामले काफी बढ़ रहे हैं। यह स्थानीय या राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक समस्या है। हमारे राज्य में भी यह कम नहीं है। इनमें डायन बिसाही, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, हत्या व प्रताड़ना, मानव तस्करी, अश्लील एसएमएस आदि शामिल हैं। नक्सल समस्याओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के उत्पीड़न के मामले कई गुणा बढ़े हैं। वर्ष 2005 के दौरान 2,544 महिलाओं के प्रति हिंसा के मामले आए। इनमें 753 दुष्कर्म, 293 छेड़छाड़, 283 अपहरण और 257 दहेज हत्या के मामले शामिल हैं। एक अध्ययन के अनुसार पूर्वी भारत में झारखंड में घरेलू हिंसा की दर सबसे अधिक रही। सर्वे के दौरान 66 फीसदी पुरुषों के हिंसक होने का पता चला। यह हिंसा न केवल शारीरिक, बल्कि यौन व मानसिक भी थी।

झारखंड अति पिछड़ा राज्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन, उत्पीड़न से उनकी सुरक्षा नहीं हो पाती। वस्तुत: परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ करने निकली महिलाओं को भी शारीरिक व यौन प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। महिलाएं खासकर नाबालिग लड़किया आर्थिक कारणों से घरेलू काम करती हैं, वे अधिकतर यौन प्रताड़ना की शिकार बनती हैं।

अन्य राज्यों की तरह झारखंड में भी अशिक्षा, निम्न सामाजिक स्तर और सांस्कृतिक कारणों से महिलाओं के प्रति हिंसा की भावना बढ़ाती है। सामान्य व ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में व्याप्त अज्ञानता की वजह से पुलिस को अनुसंधान में मदद नहीं मिलती।

मौजूदा स्थिति :

-पुलिस में महिला अधिकारियों का प्रतिनिधित्व काफी कम।

-थानों में अधिसंख्य पुरुष पुलिसकर्मी।

-महिलाएं नहीं रख पाती हैं अपनी बात। पुरुष कर्मी नहीं देते तवज्जो। -औसतन पुलिस अधिकारी व कर्मी पीड़ित महिला की समस्याओं पर संवेदनापूर्ण रुख नहीं अपनाते। (महिलाओं के प्रति हिंसा को संयुक्त राष्ट्र में इस तरह परिभाषित किया गया है-कोई भी हिंसा शारीरिक, मानसिक, यौन या फिर चेतावनी भी लिंग आधारित हिंसा के रूप में माना जाए और इसके लिए विशेष लिंग आधारित पुलिसिंग आवश्यक है।)

झारखंड में प्रशिक्षण की जरूरत :

हालांकि झारखंड में महिला थाना, सभी जिलों में काउंसेलिंग के लिए महिला कोषांग, महिला हेल्पलाइन और इव टीजिंग सेल संचालित हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। साथ ही कर्मियों की कमी, संवेदनहीनता, प्रशिक्षण के अभाव या फिर संसाधनहीनता से जूझ रहे हैं। दूसरे शब्दों में सैद्धांतिक व व्यावहारिक स्तर पर बड़ा अंतर है। एकीकृत पहल व प्रयास से इस अंतर का पाटने की जरूरत है। प्रतीकात्मक व संरचनात्मक बदलाव भी महिलाओं के प्रति होनेवाली हिंसा से लड़ने व उसका जवाब देने के लिए जरूरी है।

क्या होना चाहिए :

आंतरिक मजबूती : पुलिस संगठनों को अधिक जवाबदेह बनाया जाए। लिंग विशेष को ध्यान में रखकर पुलिस सेवा, अधिकारी स्तर तक महिला पुलिस बल की आवश्यकता है। जिम्मेदार पद तक महिला पुलिस की नियुक्ति बेहद जरूरी है। प्रत्येक पुलिस स्टेशन में महिला पुलिस सुनिश्चित किया जाए। महिला पुलिस की मौजूदगी में पीड़िता अपना पक्ष खुलकर रख सकती है।

प्रशिक्षण : कानून का अनुपालन करनेवालों को विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में लैंगिक संवेदना को शामिल किया जाना चाहिए। प्रशिक्षण में हिंसा से जुड़े कानून, यौन उत्पीड़न, पीड़ित से पूछताछ के तरीके, तस्करी आदि को लेकर जानकारी दी जानी जरूरी है। सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण देना चाहिए।

अध्यन व विश्लेषण : किसी समस्या के कारगर उपचार के लिए व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है। समस्या विशेष के आधार पर पहल करने व संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है। दोषी की पहचान, अनुसंधान में किस तरह का फोर्स लगाया जाए, इस मामले में प्रभावी लिंग आधारित पुलिसिंग का प्रयोग किया जाए।

विशेष अनुसंधान इकाई : हिंसा के मामलों के अनुसंधान के लिए समर्पित अधिकारियों की टीम बनाई जाए। डोमेस्टिक वॉयलेंस इकाई, मोबाइल पुलिस टीम बनाई जाए।

एकीकृत पहल व कार्रवाई : पीड़ित की सुरक्षा व चिकित्सकीय सुविधाएं सुनिश्चित करने के साथ ही कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। पीड़ित को स्पेशल पैकेज की व्यवस्था सरकार की दूसरी संस्थाओं सोशल वेलफेयर, वूमेन एंड चाइल्ड वेलफेयर स्कीम, हेल्थ डिपार्टमेंट के तहत हो।

पीड़ित की सुरक्षा व बचाव को लेकर सामुदायिक पुलिसिंग की व्यवस्था की जाए। जागरूकता अभियान चलाए। इसके लिए मीडिया, पर्सनालिटी और सिविल सोसाइटी व एनजीओ की मदद ली जाए।

-संपत मीणा आइपीएस, डीआइजी,

रांची रेंज


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